यह कविता मैंने तब लिखी थी जब मैं अपनी परीक्षा की तैयारी कर रहा था। मुझे अभी भी याद है वो दिन पर आज फिर मन आप सब के लिए ये कविता यहाँ लिख रहा हूँ । मैं कोई कवि नहीं हूँ बस कभी कभी शोक के तौर पर कविता लिखता हूँ ।
मैं उनके साथ....जो अँधेरे मैं भी रोशनी का दीया खोज लायें,
जोह ऊँचे ऊँचे पर्वतों से भी टकरा जाएँ ।
जोह कभी न मने हार
यार मैं हूँ उनके साथ ।
जो जमीन को आकाश से मिलाएं,
जो पर्वतो का भी सर जुकाएं ।
जोह कभी न मने हार
यार मैं हूँ उनके साथ ।
जो सगर से भी मोती चुरा ले,
जो खुद को जीत के लिए ढल ले।
जोह कभी न मने हार
यार मैं हूँ उनके साथ ।
जो उड़ा दे दुश्मन के छके ,
जो हो इरादों के पके ।
जोह कभी न मने हार
यार मैं हूँ उनके साथ ।