Monday, August 2, 2010

यह कविता मैंने तब लिखी थी जब मैं अपनी परीक्षा की तैयारी कर रहा था मुझे अभी भी याद है वो दिन पर आज फिर मन आप सब के लिए ये कविता यहाँ लिख रहा हूँ मैं कोई कवि नहीं हूँ बस कभी कभी शोक के तौर पर कविता लिखता हूँ
मैं उनके साथ....

जो अँधेरे मैं भी रोशनी का दीया खोज लायें,
जोह ऊँचे ऊँचे पर्वतों से भी टकरा जाएँ
जोह कभी मने हार
यार मैं हूँ उनके साथ

जो जमीन को आकाश से मिलाएं,
जो पर्वतो का भी सर जुकाएं
जोह कभी मने हार
यार मैं हूँ उनके साथ

जो सगर से भी मोती चुरा ले,
जो खुद को जीत के लिए ढल ले
जोह कभी मने हार
यार मैं हूँ उनके साथ

जो
उड़ा दे दुश्मन के छके ,
जो हो इरादों के पके
जोह कभी मने हार
यार मैं हूँ उनके साथ